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Holika Dahan 2026: होलिका दहन का महत्व, पूजा विधि, पौराणिक कथा और शुभ मुहूर्त

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  Holika Dahan 2026: होलिका दहन का महत्व, पूजा विधि, पौराणिक कथा और शुभ मुहूर्त होलिका दहन क्या है? होलिका दहन हिंदू धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि की रात को मनाया जाता है और इसके अगले दिन रंगों का त्योहार होली मनाया जाता है। होलिका दहन को "छोटी होली" भी कहा जाता है। इस दिन लोग अग्नि जलाकर पूजा करते हैं और अपने जीवन से नकारात्मक ऊर्जा, रोग और दुर्भाग्य को दूर करने की कामना करते हैं। हिंदू संस्कृति में यह पर्व सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह सत्य, धर्म और भक्ति की विजय का प्रतीक है। 🔶 होलिका दहन की पौराणिक कथा होलिका दहन का संबंध भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद से जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्याचारी असुर राजा था। उसने कठोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था जिससे वह लगभग अजेय हो गया था। इसके बाद वह स्वयं को भगवान मानने लगा और सभी से अपनी पूजा करवाने लगा। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु क...

होलिका अष्टक क्या है? महत्व, नियम, पूजा विधि और क्या करें क्या ना करें

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  होलिका अष्टक क्या है? महत्व, नियम, पूजा विधि और क्या करें क्या ना करें होलिका अष्टक क्या है? होलिका अष्टक हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक काल माना जाता है। यह फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ होकर पूर्णिमा तक चलता है। इन आठ दिनों को अशुभ काल माना जाता है, इसलिए इस दौरान किसी भी प्रकार के शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार आदि नहीं किए जाते। होलिका अष्टक का संबंध होली पर्व से जुड़ा हुआ है। यह समय धार्मिक साधना, पूजा-पाठ और आत्म शुद्धि के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान नकारात्मक ऊर्जा अधिक सक्रिय होती है, इसलिए विशेष सतर्कता और धार्मिक आस्था रखना आवश्यक होता है। होलिका अष्टक कब लगता है? होलिका अष्टक हर वर्ष फाल्गुन महीने में होलिका दहन से ठीक आठ दिन पहले शुरू होता है। इस समय से होली की तैयारियां धार्मिक रूप से प्रारंभ हो जाती हैं। पंचांग के अनुसार, जब फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि आती है, उसी दिन से होलिका अष्टक आरंभ माना जाता है और पूर्णिमा तक चलता है। होलिका अष्टक का पौराणिक महत्व होलिका अष्टक का संबंध भक्त प्रह्लाद और हिर...

संतान सप्तमी व्रत 2026 – महत्व, पूजा विधि, कथा और संतान सुख पाने का अचूक उपाय

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 संतान सप्तमी व्रत – महत्व, पूजा विधि, कथा और धार्मिक महत्व संतान सप्तमी व्रत क्या है? सनातन धर्म में संतान प्राप्ति और संतान की दीर्घायु के लिए अनेक व्रत और पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इन्हीं में से एक अत्यंत पुण्यदायक व्रत संतान सप्तमी व्रत है। यह व्रत मुख्य रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। यह व्रत संतान सुख की प्राप्ति, संतान की रक्षा तथा उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाता है। जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में बाधाएं आती हैं या जिनकी संतान बार-बार बीमार होती है, उनके लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। संतान सप्तमी व्रत कब किया जाता है? संतान सप्तमी व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है। इस दिन विशेष रूप से महिलाएं अपने बच्चों के सुख, स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना से यह व्रत रखती हैं। कुछ स्थानों पर यह व्रत पति-पत्नी दोनों मिलकर भी करते हैं। संतान सप्तमी व्रत का धार्मिक महत्व सना...

यमुना जी का सुंदर भजन और यमुना महिमा का दिव्य वर्णन

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  🌿 यमुना जी का भजन कब और कैसे सुनें प्रातःकाल या संध्या समय यमुना जी का भजन सुनना विशेष फलदायी माना जाता है। एक शांत स्थान पर ध्यानपूर्वक भजन सुनने से मन एकाग्र होता है और भक्ति भाव गहरा होता है। यमुना जी का सुंदर भजन 🌸 भूमिका (Introduction) हिंदू धर्म में यमुना जी को अत्यंत पवित्र और देवी स्वरूप माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण की अनेक दिव्य लीलाएँ यमुना जी के पावन तट पर ही संपन्न हुईं। यमुना माता न केवल एक नदी हैं, बल्कि वे भक्ति, करुणा और पवित्रता का प्रतीक भी हैं। यमुना जी का भजन सुनने और गाने से भक्त के मन में श्रद्धा का भाव जागृत होता है और आत्मा को अद्भुत शांति की अनुभूति होती है। 🎶 यमुना जी का सुंदर भजन  श्री यमुने तिहारो दरश मोहे भावे श्री यमुने तिहारो दरश मोहे भावे श्री गोकुल के निकट बहत हो श्री गोकुल के निकट बहत हो लहरन की सुधि आवे श्री यमुने तिहारो दरश मोहे भावे श्री यमुने तिहारो दरश मोहे भावे सुख देनी दुःख हरनी श्री यमुना सुख देनी दुःख हरनी श्री यमुना जो जन प्रात उठ न्हावे जो जन प्रात उठ न्हावे मदन मोहन जू की अति प्रिय प्यारी मदन मोहन जू की अति ...

महाशिवरात्रि व्रत 2026: पूजा विधि, नियम, कथा, लाभ और महत्व

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महाशिवरात्रि व्रत: महत्व, पूजा विधि, नियम, कथा और संपूर्ण जानकारी   महाशिवरात्रि क्या है? महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमयी पर्व है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इसे शिव और शक्ति के मिलन, सृजन और संहार, तथा आत्मा और परमात्मा के एकत्व का प्रतीक माना जाता है। साल में आने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण होती है। यह पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। महाशिवरात्रि का पौराणिक महत्व पुराणों के अनुसार महाशिवरात्रि से जुड़ी कई महत्वपूर्ण घटनाएं हैं: 1️⃣ शिव-पार्वती विवाह मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए यह दिन वैवाहिक सुख के लिए विशेष माना जाता है। 2️⃣ समुद्र मंथन और विषपान समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने इसी रात ग्रहण किया था और सृष्टि की रक्षा की। 3️⃣ शिवलिंग का प्राकट्य शिवपुराण में वर्णन है कि इसी दिन शिवलिंग रूप में भगवान शिव का प्राकट्य हुआ। महाशिवरात्रि व्रत का आध्यात्मिक महत्व महाशिवरात्रि व्रत केवल उपवास नहीं बल्कि: आत्मसंयम साधना इंद्रियों पर नियंत्...

Braj Ki Holi: मथुरा-वृंदावन की अनोखी ब्रज होली का इतिहास और महत्व

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 ब्रज की होली: मथुरा-वृंदावन की वह होली जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है भारत में होली का त्योहार प्रेम, रंग और उल्लास का प्रतीक माना जाता है, लेकिन ब्रज की होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण की लीला, भक्ति, रस और परंपरा का जीवंत रूप है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव में मनाई जाने वाली होली, पूरे देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। ब्रज की होली को देखने और अनुभव करने वाला व्यक्ति जीवन भर इस दिव्य अनुभूति को नहीं भूल पाता। ब्रज क्षेत्र क्या है और इसका धार्मिक महत्व ब्रज क्षेत्र वही पावन भूमि है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण का जन्म, बालपन और रासलीला हुई। इसमें मुख्य रूप से: मथुरा वृंदावन बरसाना नंदगांव गोवर्धन शामिल हैं। इसी कारण यहाँ की होली केवल त्योहार नहीं, बल्कि भक्ति उत्सव होती है। ब्रज की होली क्यों है सबसे अलग? ब्रज की होली बाकी जगहों से बिल्कुल अलग होती है क्योंकि: यहाँ होली कई दिनों तक मनाई जाती है रंगों के साथ भजन, कीर्तन और रासलीला होती है हर गाँव की होली की अपनी अलग पहचान होती है यह होली श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम को सम...

आदि शंकराचार्य कौन थे? चार पीठों की स्थापना, अद्वैत वेदांत और शंकराचार्य परंपरा का पूर्ण इतिहास

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आदि शंकराचार्य: सनातन धर्म का पुनर्जागरण और चार पीठों की स्थापना आदि शंकराचार्य कौन थे 🪔 भूमिका (Introduction) भारतीय सनातन संस्कृति में यदि किसी एक व्यक्ति ने धर्म, दर्शन और अध्यात्म को एक सूत्र में पिरोया, तो वे थे जगद्गुरु आदि शंकराचार्य । आज से लगभग 1200 वर्ष पहले, जब भारत धार्मिक भ्रम, मतभेद और बौद्धिक संघर्षों से जूझ रहा था, तब आदि शंकराचार्य ने वेदांत दर्शन के माध्यम से सनातन धर्म को नई चेतना दी। यह ब्लॉग आदि शंकराचार्य के जीवन, दर्शन, चार पीठों, शंकराचार्य परंपरा और चयन प्रक्रिया को पूरी गहराई से समझाने के लिए लिखा गया है। 🔱 आदि शंकराचार्य कौन थे? आदि शंकराचार्य एक महान दार्शनिक, संन्यासी, आचार्य और समाज सुधारक थे। उनका जन्म लगभग 788 ईस्वी में केरल राज्य के कालड़ी ग्राम में हुआ। माता-पिता: माता: आर्यम्बा पिता: शिवगुरु बाल्यकाल से ही शंकराचार्य में असाधारण बुद्धि दिखाई देती थी। कहा जाता है कि उन्होंने 8 वर्ष की आयु में ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। 🌸 बाल्यकाल और संन्यास जीवन शंकराचार्य का जीवन सामान्य बालकों जैसा नहीं था। कम उम्र में ही उन्होंने: वेदों का अध...