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संतान सप्तमी व्रत 2026 – महत्व, पूजा विधि, कथा और संतान सुख पाने का अचूक उपाय

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 संतान सप्तमी व्रत – महत्व, पूजा विधि, कथा और धार्मिक महत्व संतान सप्तमी व्रत क्या है? सनातन धर्म में संतान प्राप्ति और संतान की दीर्घायु के लिए अनेक व्रत और पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इन्हीं में से एक अत्यंत पुण्यदायक व्रत संतान सप्तमी व्रत है। यह व्रत मुख्य रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। यह व्रत संतान सुख की प्राप्ति, संतान की रक्षा तथा उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाता है। जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में बाधाएं आती हैं या जिनकी संतान बार-बार बीमार होती है, उनके लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। संतान सप्तमी व्रत कब किया जाता है? संतान सप्तमी व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है। इस दिन विशेष रूप से महिलाएं अपने बच्चों के सुख, स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना से यह व्रत रखती हैं। कुछ स्थानों पर यह व्रत पति-पत्नी दोनों मिलकर भी करते हैं। संतान सप्तमी व्रत का धार्मिक महत्व सना...

यमुना जी का सुंदर भजन और यमुना महिमा का दिव्य वर्णन

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  🌿 यमुना जी का भजन कब और कैसे सुनें प्रातःकाल या संध्या समय यमुना जी का भजन सुनना विशेष फलदायी माना जाता है। एक शांत स्थान पर ध्यानपूर्वक भजन सुनने से मन एकाग्र होता है और भक्ति भाव गहरा होता है। यमुना जी का सुंदर भजन 🌸 भूमिका (Introduction) हिंदू धर्म में यमुना जी को अत्यंत पवित्र और देवी स्वरूप माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण की अनेक दिव्य लीलाएँ यमुना जी के पावन तट पर ही संपन्न हुईं। यमुना माता न केवल एक नदी हैं, बल्कि वे भक्ति, करुणा और पवित्रता का प्रतीक भी हैं। यमुना जी का भजन सुनने और गाने से भक्त के मन में श्रद्धा का भाव जागृत होता है और आत्मा को अद्भुत शांति की अनुभूति होती है। 🎶 यमुना जी का सुंदर भजन  श्री यमुने तिहारो दरश मोहे भावे श्री यमुने तिहारो दरश मोहे भावे श्री गोकुल के निकट बहत हो श्री गोकुल के निकट बहत हो लहरन की सुधि आवे श्री यमुने तिहारो दरश मोहे भावे श्री यमुने तिहारो दरश मोहे भावे सुख देनी दुःख हरनी श्री यमुना सुख देनी दुःख हरनी श्री यमुना जो जन प्रात उठ न्हावे जो जन प्रात उठ न्हावे मदन मोहन जू की अति प्रिय प्यारी मदन मोहन जू की अति ...

महाशिवरात्रि व्रत 2026: पूजा विधि, नियम, कथा, लाभ और महत्व

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महाशिवरात्रि व्रत: महत्व, पूजा विधि, नियम, कथा और संपूर्ण जानकारी   महाशिवरात्रि क्या है? महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमयी पर्व है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इसे शिव और शक्ति के मिलन, सृजन और संहार, तथा आत्मा और परमात्मा के एकत्व का प्रतीक माना जाता है। साल में आने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण होती है। यह पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। महाशिवरात्रि का पौराणिक महत्व पुराणों के अनुसार महाशिवरात्रि से जुड़ी कई महत्वपूर्ण घटनाएं हैं: 1️⃣ शिव-पार्वती विवाह मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए यह दिन वैवाहिक सुख के लिए विशेष माना जाता है। 2️⃣ समुद्र मंथन और विषपान समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने इसी रात ग्रहण किया था और सृष्टि की रक्षा की। 3️⃣ शिवलिंग का प्राकट्य शिवपुराण में वर्णन है कि इसी दिन शिवलिंग रूप में भगवान शिव का प्राकट्य हुआ। महाशिवरात्रि व्रत का आध्यात्मिक महत्व महाशिवरात्रि व्रत केवल उपवास नहीं बल्कि: आत्मसंयम साधना इंद्रियों पर नियंत्...

Braj Ki Holi: मथुरा-वृंदावन की अनोखी ब्रज होली का इतिहास और महत्व

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 ब्रज की होली: मथुरा-वृंदावन की वह होली जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है भारत में होली का त्योहार प्रेम, रंग और उल्लास का प्रतीक माना जाता है, लेकिन ब्रज की होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण की लीला, भक्ति, रस और परंपरा का जीवंत रूप है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव में मनाई जाने वाली होली, पूरे देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। ब्रज की होली को देखने और अनुभव करने वाला व्यक्ति जीवन भर इस दिव्य अनुभूति को नहीं भूल पाता। ब्रज क्षेत्र क्या है और इसका धार्मिक महत्व ब्रज क्षेत्र वही पावन भूमि है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण का जन्म, बालपन और रासलीला हुई। इसमें मुख्य रूप से: मथुरा वृंदावन बरसाना नंदगांव गोवर्धन शामिल हैं। इसी कारण यहाँ की होली केवल त्योहार नहीं, बल्कि भक्ति उत्सव होती है। ब्रज की होली क्यों है सबसे अलग? ब्रज की होली बाकी जगहों से बिल्कुल अलग होती है क्योंकि: यहाँ होली कई दिनों तक मनाई जाती है रंगों के साथ भजन, कीर्तन और रासलीला होती है हर गाँव की होली की अपनी अलग पहचान होती है यह होली श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम को सम...

आदि शंकराचार्य कौन थे? चार पीठों की स्थापना, अद्वैत वेदांत और शंकराचार्य परंपरा का पूर्ण इतिहास

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आदि शंकराचार्य: सनातन धर्म का पुनर्जागरण और चार पीठों की स्थापना आदि शंकराचार्य कौन थे 🪔 भूमिका (Introduction) भारतीय सनातन संस्कृति में यदि किसी एक व्यक्ति ने धर्म, दर्शन और अध्यात्म को एक सूत्र में पिरोया, तो वे थे जगद्गुरु आदि शंकराचार्य । आज से लगभग 1200 वर्ष पहले, जब भारत धार्मिक भ्रम, मतभेद और बौद्धिक संघर्षों से जूझ रहा था, तब आदि शंकराचार्य ने वेदांत दर्शन के माध्यम से सनातन धर्म को नई चेतना दी। यह ब्लॉग आदि शंकराचार्य के जीवन, दर्शन, चार पीठों, शंकराचार्य परंपरा और चयन प्रक्रिया को पूरी गहराई से समझाने के लिए लिखा गया है। 🔱 आदि शंकराचार्य कौन थे? आदि शंकराचार्य एक महान दार्शनिक, संन्यासी, आचार्य और समाज सुधारक थे। उनका जन्म लगभग 788 ईस्वी में केरल राज्य के कालड़ी ग्राम में हुआ। माता-पिता: माता: आर्यम्बा पिता: शिवगुरु बाल्यकाल से ही शंकराचार्य में असाधारण बुद्धि दिखाई देती थी। कहा जाता है कि उन्होंने 8 वर्ष की आयु में ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। 🌸 बाल्यकाल और संन्यास जीवन शंकराचार्य का जीवन सामान्य बालकों जैसा नहीं था। कम उम्र में ही उन्होंने: वेदों का अध...

Purnima Vrat Ka Mahatva: पूर्णिमा व्रत का महत्व, नियम और लाभ

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 पौर्णिमा व्रत का महत्व | Purnima Vrat Ka Mahatva in Hindi हिंदू धर्म में पौर्णिमा व्रत का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। प्रत्येक महीने आने वाली पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है, इसलिए इस दिन किए गए व्रत, दान और पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है। शास्त्रों के अनुसार, पूर्णिमा व्रत करने से मन, शरीर और आत्मा तीनों की शुद्धि होती है तथा जीवन में सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और पुण्य की प्राप्ति होती है। पौर्णिमा व्रत क्या है? पूर्ण चंद्रमा वाली तिथि को पौर्णिमा कहा जाता है। यह तिथि भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, चंद्र देव तथा सत्यनारायण भगवान को समर्पित मानी जाती है। इसी कारण इसे कई नामों से भी जाना जाता है— सत्यनारायण पूर्णिमा लक्ष्मी पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा शरद पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा हर पूर्णिमा का अपना अलग धार्मिक महत्व होता है। पौर्णिमा व्रत का धार्मिक महत्व पौर्णिमा व्रत का उल्लेख कई पौराणिक ग्रंथों में मिलता है— विष्णु पुराण पद्म पुराण स्कंद पुराण मान्यता है कि— “पूर्णिमा के दिन किया गया दान, जप और व्रत जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश करता है।” इ...

काली बाड़ी मंदिर कोलकाता – इतिहास, दर्शन, महत्व और यात्रा गाइड

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 काली बाड़ी मंदिर कोलकाता – मां काली का दिव्य शक्तिपीठ   काली बाड़ी मंदिर, कोलकाता – आस्था, शक्ति और भक्ति का दिव्य केंद्र हैं। भारत की धार्मिक भूमि पर स्थित अनेक देवी मंदिरों में काली बाड़ी मंदिर, कोलकाता का विशेष स्थान है। यह मंदिर माँ काली की उग्र लेकिन करुणामयी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित यह मंदिर न केवल स्थानीय श्रद्धालुओं बल्कि पूरे भारत और विदेशों से आने वाले भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर बंगाल की उस तांत्रिक परंपरा से जुड़ा है जहाँ माँ काली को संहार के साथ-साथ सृजन की देवी माना जाता है। काली बाड़ी मंदिर का संक्षिप्त परिचय मंदिर का नाम: काली बाड़ी मंदिर स्थान: कोलकाता, पश्चिम बंगाल मुख्य देवी: माँ काली धर्म: सनातन हिंदू प्रसिद्धि: शक्ति उपासना एवं तांत्रिक साधना काली बाड़ी शब्द का अर्थ है — “माँ काली का निवास स्थान”। काली बाड़ी मंदिर का इतिहास काली बाड़ी मंदिर का इतिहास लगभग 300 वर्षों से भी अधिक पुराना माना जाता है। यह मंदिर उस काल में स्थापित हुआ जब बंगाल क्षेत्र में माँ काली की भक्ति अपने चरम पर थी। कहा ...